What it is like to be elder brother of PM Narendra Modi – A Must read article by Gunvant Shah

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Source for the Article: namopatrika.com

सोमा भाई मोदी तीन जनवरी को ठीक 11 बजे मेरे घर पहुंचे। यह यात्रा पहले से तय थी। सोमा भाई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी के बड़े भाई हैं, लेकिन उनके चेहरे पर अभिमान का कोई भाव नहीं था। हमने उनके साथ विभिन्न विषयों पर करीब ढेड़ घंटे तक चर्चा की। उन्होंने बताया कि “हां, ये सही है कि मैं नरेन्द्र मोदी का बड़ा भाई हूं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नहीं।”

मैंने सोमा भाई से पूछा, “क्या आप प्रधानमंत्री के आवास 7 रेसकोर्स रोड़ में कभी गए हैं?” उन्होंने बहुत ही यादगार जवाब दिया, “नहीं, गुणवंत भाई, यदि मैं अपने भाई के घर गया तो उन्हें मुझे 15-20 मिनट देने पड़ेंगे, लेकिन मैं ये समय लेना नहीं चाहता, क्योंकि इससे देश को उन कीमती मिनटों का नुकसान होगा।”

मैंने सोचा, काश! ऐसा ही भाव मोरारजी देसाई के पुत्र कांति भाई या सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने दिखाया होता।

सोमाभाई ने मुझे बताया कि “अभी तक मां और भाइयों सहित परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री आवास पर नहीं गया है।”

क्या यह एक छोटी बात है? कई मामलों में रिश्तेदार राजनेताओं के पतन का कारण बने हैं। दूसरी ओर सोमा भाई ने छोटे भाई के पद का लाभ उठाने के बारे में कभी सोचा भी नहीं।

मैंने उनसे अनुरोध किया कि मुझे कोई ऐसा यादगार प्रसंग बताइए, जिसमें वास्तविक नरेन्द्र मोदी की झलक दिखाई दे और फिर उन्होंने इस घटना के बारे में बताया:

नरेन्द्र भाई जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब एक दिन वो मेरे घर आए। उस समय मेरा पुत्र जितेन्द्र इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में था। नरेन्द्र मोदी ने उससे कुछ सवाल किए।

नरेन्द्र भाईः तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?

जितेंद्र: अगले साल B.E की डिग्री मिल जाएगी।

नरेन्द्र भाईः उसके बाद क्या करने का विचार है?

जितेंद्र: क्या आप नौकरी पाने में मेरी मदद कर देंगे? (नरेन्द्र भाई ने कोई जवाब नहीं दिया।)

जितेंद्र: क्या मैं थोड़ी आर्थिक मदद पा सकता हूं…

नरेन्द्र भाईः क्या किसी ने तेरे काका की मदद की थी? तुम्हें अपने बल पर जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।

भारतीय राजनीति में ये एक दुर्लभ घटना है जहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने परिजनों के साथ इस तरह दूरी बनाकर रहता है। नेताओं के जुड़ाव में कमी को तो कुछ हद तक समझा जा सकता है, लेकिन क्या आप परिवार के सदस्यों के प्रति ऐसे व्यवहार की कल्पना कर सकते हैं?

सोमाभाई लोगों से मिलने के दौरान कभी भी नरेंद्रभाई का जिक्र नहीं करते। बड़े भाई का ऐसा व्यवहार अत्यधिक प्रशंसनीय है। यहां तक कि 20 महीने बीतने के बाद भी, प्रधानमंत्री की मां दिल्ली में अपने बेटे के घर नहीं आई हैं। दूसरी ओर मैंने कई संतों को देखा है जो अपने परिवार के सदस्यों के साथ संबंधों को बनाए रखते हैं।

जब वो गए तो मैं अवाक रह गया। ऐसे बेटे की मां को मैं प्रणाम करता हूं।

(This post is translated in Hindi from Gunvant Shah’s article in Chitralekha Magazine)

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