Zee News Journalist Brilliantly Bashed Ravish Kumar For His Drama Show Over One Day Ban On NDTV

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एक Indian हूँ इसीलिए कुछ Express करना चाहता हूँ, एक पत्रकार हूँ (हूँ ना ??) खैर, इसलिए मन में कुछ ‘सवाल ही सवाल’ हैं ..और हाँ ‘बागों में बहार’ बिल्कुल नहीं है क्योंकि पगार कम है (वैसे पत्रकारिता के छात्रों को पता होना चाहिए की पत्रकार को पगार भी मिलती है) झा साहब और कुमार साहब को भी मिलती होगी, पर दोनों ने आज कंफ्यूज कर दिया है..सर पे ठंडा पानी डाला..खुद को आई लाइक इट वाले स्टाइल में शॉक भी दिया लेकिन कुछ सही से पकड़ में नहीं आया,अलमारी में सरकारी आलोचनाओं के बैज भी ढूंढें लेकिन वहां सिर्फ इन्क्रीमेंट लैटर ही मिला अब तक मम्मी-पापा और गर्लफ्रेंड और दोस्तों को तो मैं यही बोलता आया हूँ की मैं पत्रकार हूँ,लेकिन झा अंकल और कुमार अंकल ने दिमाग की वाट लगा दी है, समझ नहीं आ रहा की मुझे तीन साल की पत्रकारिता की पढाई में किसी ने क्यों नहीं बताया कि सरकार की आलोचना से ही पत्रकार बन पाते है..किसी ने ये भी नहीं बताया कि अपने क़स्बा और मोहल्ला की किसी नयी सड़क पे जब काला काला लिबास पहन के माइम टाइम करोगे तब पत्रकार कहलाओगे, हाँ सवाल पूछना पत्रकारिता के कोर्स में ज़रूर सिखाया था, इसलिए जब पहली बार टीवी में पहुंचा तो पहला सवाल यही पूछा की यहाँ पत्रकार कौन है…तो कोई बोला ऊ जो माइक पकड़ के खड़ा है ऊ पत्रकार है…फिर कोई बोला उ टिकर पर बैठा भी पत्रकार है, फिर इंजेस्ट वाला बोला, असाइनमेंट वाला बोला, प्रोड्यूसर बोला, सब कोई बोला की हम पत्रकार हैं, तब सांस में सांस आई लगा कि सही जगह लैंड हुए हैं..लेकिन 2-4 रोज़ पहले पता लगा कि पत्रकारों की एक नयी वर्ण व्यवस्था आई है, उसमे सबसे ऊपर कुमार और झा हैं, और इस वर्ण व्यवस्था में सरकार के खिलाफ खड़ा होनें वाले और देश से समझौता करने वाले ही असली पत्रकार है, ये अलग बात है कि ऐसा करने के लिए भी इन्हें लाखों का पैकेज मिलता है, लेकिन पत्रकार सिर्फ यही हैं..और बड़का पत्रकारों से ये भी पता लगा कि सेल्फ़ी और ट्विटर ऐगो अजब रोग के समान हैं( जो पत्रकारो को जवान कर रहा है) धत्त साला अब मेरे ज़माने में ट्विटर और सेल्फ़ी आ गयी और हम और जवान दिखने लगे तो में क्या करूँ? पत्रकारिता के ताऊ ऐसे कह रहे हैं जैसे असली ताऊ कहते हैं ना बेटियों का रात को घर से बाहर जाना ठीक नहीं ऐसे ही सेल्फी लेना या ट्वीट करना घातक रोग के लक्षण हैं…भाई आप स्क्रीन को काला पीला करके रुदाली बन जाओ तो कुछ नहीं, आप ही पत्रकारिता के मानदंड तय करो तो कुछ नहीं, भई इस देश में हर तरह की पत्रकारिता होगी , जिसको जो अच्छा लगे वो उसे ताल ठोक के अपना आदर्श मन लें , जिसको आलोचना का बैज लेना है वो वही लें, जिसको सवाल पूछने है वो सवाल पूछे, जिसको सेल्फी लेनी है वो सेल्फी ले, बस आप मुझे ये न बताये की पत्रकारिता क्या है…क्योंकि हिंदी जनसंचार एवं पत्रकारिता नामक कोर्स पे मैंने करीब 50-60 हज़ार रुपये और फिर मीडियाकर्मी (टीवी वाला) बनाने वाले कोर्स पर करीब 2.5 लाख (इसमें बाकी खर्चे शामिल नहीं हैं) खर्च किये है,इसलिए अपनी पत्रकारिता को स्वर्ण बताने के लिए मेरी पत्रकारिता को दलित मत बताइये। और रही बात सवाल पूछने की तो एक सवाल आप खुद से भी पूछ सकते हैं कि जब आपके सर के ऊपर डांडिया मेरा मतलब राडिया हो रहा था तब आपके सवाल बागों में। बरखा और बहार नहीं ढूंढ पाये थे क्या? और झा साहब… सरकार की आलोचना होनी चाहिए बिलकुल होनी चाहिए बस ये ध्यान में रहे की आलोचना का संतुलन पिछली और नयी।सरकारों को लेकर एक जैसा हो..क्योंकि विचारों का भारी ‘तख्तापलट’ भरोसे को कू मंतर मेरा मतलब छू मंतर कर देता है।

Facebook Post By Rahul Goel, producer of @DNA.

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